‘सामाजिक न्याय’ का सीधा सा अर्थ है कि दो व्यक्तियों के मध्य उनकी सामाजिक स्थिति (जाति,धर्म,रंग,क्षेत्र) के आधार पर किसी प्रकार का अंतर न माना जाए।  हर मनुष्य को अपनी शक्तियों के समुचित विकास के समान अवसर उपलब्ध हों, किसी भी व्यक्ति का किसी भी रुप मे शोषण न हो,  समाज का कोई भी वर्ग स्वयं को असहाय अनुभव न करे। समाज के प्रत्येक व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी हों और आर्थिक सत्ता केवल कुछ हाथों में ही केन्द्रित न हों। फिर भी भारत में कुछ दल ऐसे हैं, जो स्वयं को सामजिक न्याय की विचारधारा से प्रेरित तो बताते हैं, मगर उनकी वास्तविक नीतियों को देखा जाए तो वे स्वयं में एक अतिजातिवादी समाज की रचना में लगे हुए हैं।
यूं तो भारत में ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति मंडल आंदोलन के बाद से स्थापित हुई, मगर देश में पिछड़े समाज की राजनीतिक गोलबंदी के लिए सामाजिक न्याय का नारा शुरू से आधार रहा है। भारत में समाजवादी विचारधारा के जनक कहे जाने वाले डॉ० राम मनोहर लोहिया और दलितों के मसीहा डॉ० अम्बेडकर, देश में सामाजिक न्याय के मूल्यों को स्थापित करने के लिए एक पार्टी के गठन की तैयारियां कर रहे थे, और इसी उद्देश्य के लिए दोनों के बीच 1955 तक पत्र-व्यवहार भी चला था। मगर बाद में यह योजना राजनैतिक कारणों से ठन्डे बस्ते में चली गयी। राम मनोहर लोहिया का मानना था कि भारत की सवर्ण जातियों को संपन्न माना जाना चाहिए और तमाम वंचित वर्गों, जिनमें आदिवासी, दलित, अन्य पिछड़ी जातियां और यहां तक कि सभी समुदायों की महिलाएं भी शामिल हैं, को दरिद्रतम श्रमिक वर्ग माना जाना चाहिए।
साठ के दशक से भारत में समाजवादी विचारधारा के साथ-साथ क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के पीछे लोहिया की इस अनूठी व्याख्या का ही योगदान रहा है, इस व्याख्या ने भेदभाव कम करने की बजाय जातिगत पहचानों को और मजबूती दी। डॉ० लोहिया के विचारों पर आधारित कई नेताओं का उदय हुआ, जिन्हें असली पहचान आपातकाल के बाद जेपी आंदोलन के समय मिली, इनमें मुलायम सिंह, नितीश कुमार, शरद यादव, लालू प्रसाद यादव आदि शामिल हैं।
‘सामाजिक न्याय’ की जो वर्तमान राजनीति है उसका उदय 7 अगस्त 1990 के बाद हुआ, इस दिन को पिछड़े समाज द्वारा ‘सामाजिक न्याय दिवस‘ के रूप में मनाया जाता है। दरअसल 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का आदेश दिया था। जिसके बाद से पिछड़ी जाति के लोगों को रोजगार और शिक्षा में  27% आरक्षण दिए जाने का रास्ता साफ़ हो गया; इसके विरोध में स्वाभाविक रूप से सामान्य वर्ग के लोगों ने एक बड़ा विरोध दर्ज किया, जो कि शासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका था। वहीं आरक्षित श्रेणी के लोगों को यह लगा कि कहीं विरोध के दवाब में सरकार मंडल कमीशन की सिफारिशों को वापस न ले ले, इसीलिए उन्होंने मंडल आयोग के समर्थन में आंदोलन शुरू कर दिया। जमकर वर्ग संघर्ष हुआ, हज़ारों जानें गयीं और इस जाति संघर्ष में अपनी-अपनी जातियों को लेकर प्रदर्शन कर रहे नेताओं की राजनीति खूब चमकी। आंदोलन के बहाने वे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान पा चुके थे, और अपनी इसी राजनीति को उनके द्वारा “सामाजिक न्याय” की राजनीति बता कर प्रचारित किया जाने लगा।
मंडल कमीशन की सिफारिशों में पिछड़ी जाति के लोगों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण दिए जाने की बात की गई थी, जिसके लागू होते ही पिछड़ी जातियां विशेषतः यादव जाति के नेताओं की ओर से यह बात प्रचारित की जाने लगी कि अब पिछड़ों का “क्रांतिकारी राजनीतिक उभार” प्रारंभ हो गया है, मंडल समर्थन से ‘सामाजिक न्याय’ का शासन स्थापित होगा और हजारों साल से ‘छले गए पिछड़ों को उनका ‘हक’ मिलेगा। स्पष्ट है यहाँ ये ‘हक़’ उन्हें सवर्ण जातियों से मिलने वाला था। इसीलिए इस घटना के बाद जो राजनीति का प्रारंभ हुआ वह परोक्ष रूप से सवर्णों के विरोध की राजनीति थी। जिस नेता ने जितना विरोध किया उसे उतना ही अपनी जाति का समर्थन मिलता चला गया।
“सामाजिक न्याय” का दावा करने वाले मंडल समर्थक नेता अपनी सभाओं में सवर्णों को कोसते, मज़ाक बनाते और पिछड़ों के कल्याण करने का वादा करके वाहवाही प्राप्त करते। दोआबा क्षेत्र अर्थात गंगा-यमुना के इलाकों में जातिगत राजनीति से न सिर्फ़ सरकारें बनीं, बल्कि इसके नेताओं का प्रभाव भारत की राष्ट्रीय राजनीति में पूरी तरह दिखने लगा. वहीं दूसरी ओर कट्टर हिंदुत्व की राजनीति में भी पिछड़े नेताओं का उभार शुरू हो गया था।

OBC और दलित नेतृत्व के दो रंग 90 के दशक में ही बन रहे थे, जिसमें से एक रंग मुसलमानों को साथ मिलाकर खुद को “सामाजिक न्याय” से परिभाषित कर रहा था और दूसरा जातियों में बिखर रहे हिंदुत्व को इकट्ठा करने के लिए पिछड़े नेताओं को उभार रहा था, और इसे “भाजपा” के रूप में मजबूत कर रहा था। अर्थात एक छोर पर लालू प्रसाद, मुलायम सिंह, कांशीराम-मायावती, रामविलास पासवान की राजनीति थी तो दूसरे छोर पर कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार आदि की।
दलित-यादवों को छोड़ दिया जाए तो, भाजपा तो अपने बंट रहे हिन्दू मतदाताओं को एक झंडे के नीचे लाने में काफी हद तक सफल रही मगर “सामाजिक न्याय” की राजनीति का दावा करने वाले नेता, वंशबेल को राजनीति में रोपने लगे।
वस्तुत: ‘सामाजिक न्याय’ के सिद्धांतों को सभी दलों ने सत्ता को प्राप्त करने की सीढ़ी बना ली। रोचक बात यह है कि सामाजिक न्याय के पुरोधाओं ने पहले ही इन संभावनाओं के विषय में भविष्यवाणी की थी। डॉ० अम्बेडकर और डॉ० लोहिया दोनों का कथन था कि “सत्ता की लालच में दलित और पिछड़े भी अगड़ों की तरह व्यवहार करेंगे।“ सामाजिक न्याय की राजनीति दलित-पिछड़ों का उत्थान ना होकर सर्वर्णों का विरोध और सत्ता प्राप्त करने की सीढ़ी बन गयी। लालू, मुलायम और मायावती तीनों सामाजिक न्याय की राजनीति के उत्पाद हैं लेकिन नेता जाति व्यवस्था को समाप्त करने की बजाय उसे नई मजबूती देने का काम कर रहे हैं।
सामाजिक न्याय की परिभाषा में ये कहीं नहीं है, कि समानता के लिए संपन्न वर्ग के प्रति नफरत पैदा की जाए; सामाजिक न्याय की परिभाषा आरक्षण की पैरवी नहीं करती, अवसर की समानता की बात कहती है। एक समाज को मजबूत करने का आशय दूसरे समाज को कमज़ोर करने से नहीं होता। ये बात सभी को समझने की है। भारत में जिसे “सामाजिक न्याय” का नाम देकर वर्णव्यवस्था का अंत बताया जाता है वास्तव में वह वर्णव्यवस्था का नया रूप है। हमें एक बड़े सामाजिक सुधार की आवश्यकता है जिसमें आरक्षण और मुफ्तखोरी की कहीं जगह नहीं।