मंडल आयोग के बाद उपजी विरोध की चिंगारी कोई छोटी नहीं थी। इस चिंगारी ने धीरे-धीरे आग का रूप ले लिया था।  मंडल कमीशन के बाद वीपी सिंह के विरोध का जो सिलसिला शुरु हुआ था, वह आत्मादाह की एक बड़ी श्रृंखला में बदलता चला गया। इनमें पहला नाम राजीव गोस्वामी और सुरिंदर सिंह चौहान का था।
राजीव गोस्वामी दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज में वाणिज्य के एक छात्र थे। जिन्होंने प्रधान मंत्री वी.पी. सिंह द्वारा भारत में पिछड़ी जातियों के लिए नौकरी की आरक्षण के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन के विरोध में आत्म-बलिदान करने का प्रयास किया था। गोस्वामी ने मंडल आयोग के खिलाफ एक बड़े आंदोलन की अगुवाई की और विरोध प्रदर्शन करते हुए आत्मदाह का प्रयास किया जिसमें  वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इसके बाद पूरे भारत में कॉलेज के छात्रों द्वारा आत्म-दाह करने की एक श्रृंखला शुरू हो गई।
गोस्वामी बाद में दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टुडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष के पद पर भी चुने गए। लेकिन स्वास्थ्य समस्याओं के कारण बाद में उन्होंने सक्रिय राजनीति छोड़ दी और अपना खुद का व्यवसाय शुरू किया। बीते वर्षों में वह अस्पतालों में अधिक और बाहर कम रहे थे क्योंकि उनके आत्म-दाह के परिणामस्वरूप गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं बनीं हुई थीं।
वह नई दिल्ली के कालाकाजी में गोमती अपार्टमेंट के निवासी थे। 24 फरवरी, 2004 को, 33 वर्ष की आयु में, होली फॅमिली अस्पताल ओखला, नई दिल्ली में उनका निधन हो गया। उनके परिवार में उनकी पत्नी आरती, बेटी सिमरन, बेटे आदित्य, और उनके पिता मदन गोस्वामी व मां नंदरानी गोस्वामी भी  हैं। उनकी मां, नंदरानी गोस्वामी, 2006 में आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन करने वालों में से एक थीं।
वहीं  सुरिंदर सिंह चौहान जाति के आधार पर आरक्षण के लिए मंडल आयोग की सिफारिश के क्रियान्वयन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने वालों में शामिल थे।  वे रक्षा मंत्रालय में एक लिपिक के रूप में कार्यरत थे, 24 सितंबर, 1990 को देशबंधु कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में उन्होंने एक आत्महत्या नोट के साथ खुद को आग के हवाले कर लिया – “मेरी मौत की जिम्मेदारी उन लोगों पर है जो आरक्षण को वोट बैंक मानते हैं, वी.पी. पासवान, यादव जैसे लोग”।
इस श्रृंखला में अगला नाम मोनिका चड्डा का था, दक्षिण दिल्ली निवासी 19 वर्षीय मोनिका चड्डा ने अपार्टमेंट से निकल कर छत पर खुद को आग लगा ली। वास्तव में, आग लगने से एक घंटे पहले उसने अपनी माँ से कहा था कि ऐसा करने की उसकी इच्छा है।
जिसके जवाब में उसकी माँ ने यह उत्तर दिया कि: “वी.पी. सिंह के घर जाओ और उन्हें बताओ कि तुम आरक्षण के बारे में क्या महसूस करते हो, मौत कोई समाधान नहीं है।”  90 प्रतिशत जलने के बाद भी जीवन के लिए संघर्ष करती हुई मोनिका अपनी आंटी को प्रोत्साहित कर रही थी: “आप भी बोलो ना, वी.पी. मुर्दाबाद।”
चंडीगढ़ की 16 वर्षीय शमा गुप्ता ने भी टीवी पर किसी अन्य लड़की के आत्मदाह की खबर सुनने के तुरंत बाद खुद को आग लगा दी। कुछ दिनों से वह उन विद्यार्थियों के बारे में सुन रही थी, जो आरक्षण के कारण, अच्छे अंक के बावजूद नौकरी पाने में नाकाम रहे थे।
महिलाओं के लिए समान अधिकार में दृढ़ विश्वास रखने वाली, शमा ने अपने आत्महत्या नोट में लिखा: “वी.पी. सिंह, आप देख सकते हैं कि सिर्फ लड़के ही नहीं बल्कि लड़कियां भी आरक्षण के विरुद्ध बलिदान कर रहीं है। परिवार को उसके ‘बलिदान’ पर गर्व है।”
इसके अलावा देश भर में बड़े पैमाने पर आत्मदाहों की खबरें आती रहीं, कई छात्रों की मृत्यु पुलिस लाठी चार्ज से भी हुई। विरोध और झड़पों का यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक सुप्रीम कोर्ट ने वीपी सिंह सरकार के फैसले पर अस्थायी तौर पर रोक न लगा दी।

“अन्यायपूर्ण और अतार्किक आधार पर लागू किये गए आरक्षण के फैसले से देश भर में जो व्यापक आक्रोश और निराशा व्याप्त हुई थी वह आज भी कायम है। भले ही आत्मदाह की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं न हों मगर फिर भी देश की करोड़ों युवा प्रतिभाएं आरक्षण की उस ज्वाला में हर रोज़ स्वाहा हो रही हैं। इससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह है कि आरक्षण के विरुद्ध इस लड़ाई में युवा और छात्र 1990 में भी अकेले थे और आज भी अकेले हैं। किसी भी राजनैतिक व्यक्ति का समर्थन/संरक्षण इन आरक्षण के विरुद्ध लड़ रहे युवाओं को कभी प्राप्त न हो सका। देश में योग्यता और समानता के लिए न्याय मांग रहे इन युवाओं को दरकार है किसी ऐसे नेतृत्व की जो न सिर्फ आंदोलन को नेतृत्व दे सके बल्कि आरक्षण के विरुद्ध एक प्रभावी कानूनी लड़ाई को भी दिशा दे सके।“