सरदार भगत सिंह

शहीद भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1908 में पंजाब प्रान्त के ल्यालपुर जिले के जरांवाला तहसील के बंगा गाँव में हुआ। उनका परिवार राजनीति में सक्रिय था। भगत सिंह के पिता स्वामी दयानन्द के अनुयायी थे, जिसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके पिता और उनके चाचा स्वतंत्रता सेनानी थे, जिसके परिणामस्वरूप भगत सिंह के रुधिर में भी देशभक्ति की भावना बहती थी। अन्य साथियों से भिन्न, उन्होंने खालसा हाई स्कूल न जाकर दयानन्द ऐंग्लोवैदिक स्कूल में अपना दाखिला करवाया जो कि एक आर्यसमाजी हिन्दू संस्थान था। पूर्व में मुग़ल और फिर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा भारत में धर्म और संस्कृति पर किये जा रहे अत्याचारों से वे बेहद व्यथित थे। अपनी प्रारंभिक आयु में ही उन्होंने महात्मा गाँधी द्वारा शुरू किये गए असहयोग आंदोलन का अनुगमन किया। परन्तु चौरी-चौरा घटना के उपरांत गांधीजी द्वारा आंदोलन के वापस लेने पर भगत सिंह ने खुद को गाँधी जी की अहिंसावादी लड़ाई से अलग कर लिया और क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़ गए। वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में शामिल हुए, जिसमें चंद्र शेखर आज़ाद, राम प्रसाद बिस्मिल और शहीद अशफ़ाक़ उल्लाह खान जैसे बड़े नेता सक्रिय थे। बी.ए करने के दौरान भगत सिंह के पिता ने उन्हें शादी करने के लिए कहा। जिसे नकारते हुए उन्होंने कहा “आज़ादी ही मेरी दुल्हन है।” यूरोपीय राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने नौजवान भारत सभा का आयोजन किया।

1928 में ‘सांडर्स हत्याकाण्ड’ के वे प्रमुख नायक थे। 8 अप्रैल, 1929 को ऐतिहासिक ‘असेम्बली बमकाण्ड’ के भी वे प्रमुख अभियुक्त माने गये थे, जो कि भगत सिंह के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी; हालाँकि उनका उद्देश्य भीड़ में किसी को क्षति पहुँचाना नहीं था, सिर्फ अपनी आवाज़ अंग्रेजी हुकूमत को सुनाना था। जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और सुनवाई के उपरांत उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। अपने कारावास के दौरान भगत सिंह अपना समय लिखने में व्यतीत करते थे। भगत सिंह ने कैदियों के साथ बर्ताव में भेदभाव के विरुद्ध अनशन किया जो 116 दिनों तक चला; परन्तु गांधीजी और अपने पिता के समझाने पर उन्होंने अपना व्रत तोड़ दिया।
भगत सिंह और उनके साथियों पर ‘लाहौर षड़यंत्र’ का मुक़दमा भी जेल में रहते ही चला। भागे हुए क्रांतिकारियों में प्रमुख राजगुरु पूना से गिरफ़्तार करके लाए गए। अंत में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई गई। 23 मार्च 1931 की सुबह प्रसन्नतापूर्वक “इन्कलाब ज़िंदाबाद” “लॉन्ग लाइव द रेवोलुशन” “डाउन विद ब्रिटिश इम्पेरिअलिस्म” के नारे लगते हुए फांसी के तख्ते की तरफ अग्रसर हुए। उसी दुर्भाग्यपूर्ण सुबह 7:30 बजे उन्हें फांसी दे दी गई और हज़ारों युवाओं के प्रेरणास्रोत महान स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह परमतत्व में विलीन हो गए। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है।