रविंद्रनाथ टैगोर

रबिन्द्र नाथ टैगोर, भारत के राष्ट्रगान के रचयिता हैं, उनका जन्म देबेन्द्र नाथ टैगोर और सारा देवी के यहाँ 7 मई 1861 में जोरसंको भवन में हुआ। वे अपने भाई बहनों में सबसे छोटे थे। उनकी माता की अकालघाटित मृत्यु के पश्चात् उनके नौकरों ने उनका पालन पोषण किया। बचपन में उन्हें घूमना और चीज़ों का निरीक्षण करना बहुत पसंद था अत: उनका मन कभी कक्षा में नहीं लगता था। 1978 में उन्होंने इंग्लैंड के ब्रिंग्टन में एक पब्लिक स्कूल में दाखिला लिया। वह वकील बनना चाहते थे। बाद में उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में पढाई की परन्तु बुरे प्रदर्शन की वजह से उन्हें वापस बुला लिया गया। जिसके बाद उनके पिता जी ने उनका एक दस वर्षीय कन्या के साथ विवाह करवा दिया, जिसका नाम मृणालिनी था। अपनी युवा अवस्था से ही उन्हें लिखने का अत्यंत शौक था। 16 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी सबसे पहले लघु कथा लिखी।
अपनी सुप्रसिद्ध कविताओं के अलावा वे सांस्कृतिक क्रियकलापों में भी रूचि रखते थे व साहित्यिक कार्यो जैसे निबंध, लघु कथा, यात्रा वृत्तांत, नाटक एवं गीत लिखने में भी निपुण थे। वे चित्रकारी के भी विशेषज्ञ थे। वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने तीन देशों के राष्ट्रगान की रचना की। वे यूरोपीय उपनिवेशवाद के आलोचक थे। रविंद्रनाथ टैगोर ने अपने स्वदेशी समाज नामक किताब में हिंदू राष्ट्र की संकल्पना और आह्वान किया। वे स्वावलम्बन, आत्मनिर्भरता और लोगो के बौद्धिक उत्थान पर ज़ोर देते थे। उन्होंने देशवासियों से आग्रह किया ” हमें अंधी क्रांति की नहीं बल्कि नियमित और उद्देश्यपूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है। उन्होंने भारत की आज़ादी के आंदोलन की प्रशंसा के लिए भी गीतों की रचना की। 1919 के जलियावाला बाग़ के नरसंहार के विरोध में उन्होंने नाइट की पदवी, जो उन्हें उस समय की सरकार से उनकी साहित्यिक रचनाओं के लिए मिली थी, त्याग दी। उन्होंने गांधी-आंबेडकर के विवाद को भी सुलझाया। वे रूढ़िगत शैक्षिक तरीको के पक्ष में नहीं थे। अपने अनुभव से उन्होंने एक अलग तरह की शिक्षा के बारे में सोचा और विश्व भारती यूनिवर्सिटी के नाम से विश्वविद्यालय की स्थापना की। जिसके लिए धन जुटाने में उन्होंने कठिन मेहनत की। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी नोबल पुरस्कार धनराशि भी इस विशविद्यालय में लगा दी। वे इस विश्वविद्यालय को ” मानवता की शिक्षा के लिए विश्व केंद्र बनाना चाहते थे…कहीं राष्ट्र और भूगोल की सीमाओं से परे”। वे भारत को अंग्रेज़ों से आज़ाद देखना चाहते थे और उन्होंने एक ऐसे भारत का सपना देखा जहाँ के विचार भयमुक्त हों। और अपने इसी सपने के साथ उन्होंने 7 अगस्त 1941 को 80 वर्ष की आयु में अपनी अंतिम सांस ली।