महाराणा प्रताप

 

प्रताप सिंह, जिन्हें महाराणा प्रताप के नाम से जाना जाता है, मेवाड़, राजस्थान के शिशोदिया राजवंश के महान हिन्दू राजा थे। महाराणा प्रताप का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया रविवार विक्रम संवत 1597 तदानुसार 9 मई 1540 को मेवाड़ में हुआ था। प्रताप, उदय सिंह द्वितीय और महारानी जयवंता बाई के सबसे बड़े पुत्र थे। ‘मेवाड़-मुकुट मणि’ राणा प्रताप अकेले ऐसे वीर थे, जिसने मुग़ल बादशाह अकबर की अधीनता किसी भी प्रकार से स्वीकार नहीं की। वे हिन्दू कुल के गौरव को सुरक्षित रखने में सदा तल्लीन रहे। अकबर ने प्रताप के पास शांति संबंधों के लिए छ: राजनायिक नियोग के प्रस्ताव रखे, जैसे उसने शेष राजपूताना शासकों के समक्ष रखे थे। इनमें से पांचवा प्रस्ताव, जो कि भगवान दास द्वारा पहुंचाया गया, प्रताप को फलदायक लगा और उन्होंने अपने पुत्र अमर सिंह को अकबर के दरबार में भेजा। हलाकि यह नियोग भी असफल रहा क्योंकि प्रताप ने खुद को मुगल दरबार में प्रस्तुत करने को अस्वीकार कर दिया था।
प्रताप का यह खंडन अकबर को अपमानजनक लगा जिसके उपरांत अकबर ने युद्ध का आगाज़ किया। हल्दी घाटी और देवेर के प्रचंड युद्ध के बाद अकबर ने 1587 में मेवाड़ में युद्ध विराम की घोषणा कर दी। प्रताप न सिर्फ एक योद्धा थे बल्कि वे हिंदुत्व के सांस्कृतिक मूल्यों में भी निपुण थे। महाराणा प्रताप ने मेवाड़, मारवाड़, बूंदी, आमेर समेत लगभग पूरे राजस्थान को मुगलो से मुक्त कराया था। मेवाड़ में वित्तीय कमी के समय प्रताप घास की रोटी खाया करते थे। उन्होंने शपथ ली, ” मेरे वीर भाइयो, हमारी मातृभूमि, मेवाड़ की यह पवित्र भूमि, अभी तक मुगलो के चंगुल में है। आज आप सबके सामने मैं यह शपथ लेता हूँ, जब तक चित्तौड़ को स्वतंत्र न करवा लूँ तब तक न मैं सोने-चांदी की थाली में खाऊंगा, न नर्म मुलायम बिछोने पर सोऊंगा और न महल में रहूँगा बल्कि मैं पत्तो पर खाना खाऊंगा, भूमि पर सोऊंगा, झोपडी में रहूँगा…” परन्तु दुर्भाग्य से वे चित्तौड़ (मेवाड़ की पूर्व राजधानी) को मुक्त नहीं करवा सके। अतः अपनी शपथ के अनुसार उन्होंने कभी भी राजमहल में प्रवेश नहीं किया। उन्होंने चांवड को अपनी राजधानी बनाया जो महाराणा प्रताप द्वारा सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों की उन्नति का प्रतीक है। वे चांवड के राजमहल के पास एक छावनी में रहा करते थे। 19 जनवरी, 1597 में प्रताप जैसे परमवीर का गंभीर चोटों की वजह से देहांत हो गया। उनके अंत समय के शब्द कुछ इस प्रकार थें “यदि पुर्नजन्म का तथ्य सच है, तो मैं ईश्वर से आग्रह करूँगा कि मुझें एक और मौका दे ताकि मैं अपनी मातृभूमि को पूर्णरूप से स्वतन्त्र करवा सकूं …जय मेवाड़…जय माँ भारती।” महाराणा प्रताप राजपूताना और हिंदुत्व के रक्षक थे। अपनी मातृभूमि को आक्रांताओं के चंगुल से मुक्त कराने के लिए उन्होंने अत्यंत कष्टों का सामना किया।