प्रो० बलराज मधोक

 

बलराज मधोक का जन्म 25 फरवरी, 1920 में बल्टिस्तान के स्कार्दू में हुआ। उनके पिता जगन्नाथ मधोक जम्मू कश्मीर के लद्दाख़ में एक सरकारी अधिकारी थे। बलराज मधोक ने अपनी उच्चतर माध्यमिक शिक्षा श्रीनगर से और स्नातक स्तर की पढ़ाई लाहौर से की।

श्रीनगर के पीजीडीएवी कालेज में प्रोफेसर रहे मधोक प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। परतंत्र भारत में धर्म की जो हानि हुई थी, प्रो० मधोक उससे बहुत चिंतित थे, और बिखरे हुए समाज को एकत्र कर भारत को एक अखंड शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहते थे। श्रीनगर में प्रो० बलराज मधोक का संपर्क हजूरी बाग के पुरोहित पं० विश्वबन्धु से हुआ, जिनका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। हजूरी बाग श्रीनगर के गैर कश्मीरी हिन्दुओं की धार्मिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र था।
1938 में अपनी पढ़ाई के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में वे एक कार्यकर्ता के रूप में शामिल हुए और बाद में जनसंघ में एक राजनेता के रूप में प्रसिद्ध हुए। प्रो० बलराज मधोक ने एम.ए. की परीक्षा इतिहास विषय में उत्तीर्ण की और ‘स्वतन्त्रता आन्दोलन में आर्य समाज का योगदान’ विषय पर शोध कार्य आरम्भ किया। आज़ादी के बाद जब पाकिस्तान ने अक्टूबर, 1948 में कश्मीर पर आक्रमण किया, तब मधोक डी.ए.वी. कॉलेज, श्रीनगर में उपप्रधानाचार्य थे। इस दौरान उन्होंने एक स्वयंसेवक के रूप में विशेष कार्य किया। उन्होंने शरणार्थी रिलीफ कमेटी का निर्माण किया और विभाजन के कारण कश्मीर में पलायन झेल रहे शरणार्थी हिन्दुओं को आर्थिक व सामाजिक सहायता प्रदान की।
उन्होंने जम्मू में हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व किया। 1951 में उन्होंने ही अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् नामक छात्र संघ की नींव रखी थी। पंजाब और दिल्ली में भी उन्होंने जनसंघ की शाखा को स्थापित किया। 1961 के लोकसभा चुनाव में मधोक को विजय प्राप्त हुई। 1966-67 में वे जनसंघ की अध्यक्षता के लिए भी सामने आये। 1973 में एल० के० आडवाणी द्वारा तीन साल तक निष्कासित किये जाने के उपरान्त मधोक को आपातकाल के समय 18 महीनो के लिए कैद में रखा गया। मधोक जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के खिलाफ थे। 1979 में उन्होंने ‘भारतीय जनसंघ’ को जनता पार्टी से अलग कर लिया। उन्होंने अपनी पार्टी को बढ़ाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सफलता हासिल नहीं हुई। बाद में वे जनता पार्टी में जनसंघ का विलय हुआ, जिसमें वे शामिल हुए। परन्तु कुछ समय बाद 1979 में इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने जनसंघ को अखिल भारतीय जनसंघ के नाम से पुर्नजीवित किया। आजीवन परिश्रम के बाद बीमारी की वजह से 96 वर्ष की आयु में मई 2, 2016 के दिन उनका देहांत हो गया।