नेताजी सुभाष चंद्र बोस

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 में कटक, ओडिसा डिवीज़न, बंगाल प्रान्त में, पद्मावती और जानकीनाथ बोस, जो की एक वकील थे, के यहाँ हुआ। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्रोटेस्टियन यूरोपियन स्कूल से की तथा उसके उपरांत 1909 में उन्होंने रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में अध्ययन किया। जिस दिन से सुभाष उस विद्यालय में भर्ती हुए थे, उस विद्यालय के प्रधानाचार्य बेनीमेधाब दाससमझ गए थे कि सुभाष अत्यंत मेधावी एवं प्रतिभाशाली थे। मैट्रिक में दूसरे स्थान प्राप्त करने के बाद उनका दाखिला कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुआ। वह बड़े ही धार्मिक भावना वाले जननायक थे, वे राष्ट्रवाद की ऐसी भावना रखते थे कि एक बार अपने प्राध्यापक पर भारत के विरुद्ध टिपण्णी करने पर उन्होंने धावा बोल दिया, जिसके लिए उन्हें बाद में निष्कासित कर दिया गया। जिसके बाद उन्होंने स्कॉटिश चर्च कॉलेज से तत्वज्ञान में अपनी बी.ए संपन्न की। इसके बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया गया। वे इंग्लैंड के लिए रवाना हुए अपने पिता को किये इस वादे के साथ कि वह भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा देंगे।
अपने वचन के अनुसार उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा दी और चौथे स्थान के साथ सफल हुए तथा उनका चयन हुआ। परन्तु वे विदेशी सरकार की नौकरी नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने त्यागपत्र दे दिया तथा अपने बड़े भाई को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा “केवल बलिदान की मिट्टी पर हम अपने राष्ट्रीय भवन को खड़ा कर सकते हैं”। उन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों पर एक किताब लिखी जिसका नाम था ” द इंडियन स्ट्रगल”। वह किताब लंदन में प्रकाशित हुई परन्तु उस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया इस डर से कि वह किताब अशांति का कारण बनेगी। वे युवा कांग्रेस विंग के नेता बने। परन्तु बाद में गाँधी और कांग्रेस हाई कमांड से विवाद के चलते उनको बेदखल कर दिया गया। उस दौरान “भारतीय राष्ट्रीय सेना” जापान के मेजर के दिमाग की उपज थी जिसे बाद में भंग कर दिया गया क्योंकि मोहन सिंह, जो कि प्रधान सदस्यों में से एक थे, उनका मानना था कि भारतीय राष्ट्रीय सेना जापानी हाई कमांड के लिए केवल एक प्यादा और प्रचार उपकरण है। जिसके उपरांत मोहन सिंह को हिरासत में लिया गया और सैनिकों को युद्ध शिविर में भेज दिया गया। सुभाष चंद्र बोस के आने के बाद भारतीय राष्ट्रीय सेना को “आज़ाद हिन्द फ़ौज” के रूप में पुनर्जीवित किया गया। रास बिहारी बोस, भारतीय राष्ट्रीय सेना के संस्थापक सदस्य ने सेना की ज़िम्मेदारी सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी। भले उनकी सेना ने कई बार हार का सामना किया उन्होंने सेना और आज़ाद हिन्द के प्रति समर्थन बनाए रखा। एक बार बर्मा की एक रैली में उन्होंने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा” का नारा दिया था। उन्होंने ही ”जय हिन्द का भी नारा दिया था”। अपने पलायन के दौरान वे जर्मनी से रात को रेडियो प्रसारण करते थे। 6 जुलाई 1944 को उनके एक प्रसारित भाषण में उन्होंने गांधीजी को राष्ट्रपिता कह कर उल्लिखित किया। यह पहली बार था जब गांधीजी को इस उपाधि से पुकारा गया। उनकी मृत्यु रहस्यमय रूप से हुई और लोगों का मानना है कि वे विमान दुर्घटना में मारे गए। तब तक वे एक विख्यात स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उभर चुके थे, और वे लोग जिन्हे भारत की अंग्रेजी सरकार से आज़ादी चाहिए थी वे उनके लिए आदर्श बन चुके थे और आज भी वे राष्ट्रवादी देशभक्तों के लिए एक मिसाल हैं।