डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी

 

डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक भारतीय राजनीतिज्ञ, वकील और विद्वान थे। उनका जन्म 6 जुलाई ,1901 में बंगाली कुलीन हिन्दू ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता कलकत्ता हाई कोर्ट मे न्यायाधीश थे। उनका नाम आशुतोष मुखर्जी था। श्यामा प्रसाद ने अपनी एम. ए. 1923 में और बी. एल. 1924 में पूरी की। अपने पिता की मृत्यु उपरांत उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में वकील के रूप में खुद को नामाँकित करवाया। उन्होंने अपनी राजनीति गतिविधियां 1929 से शुरु कीं। राष्ट्रीय एकात्मता एवं धार्मिक अखण्डता के प्रति आगाध श्रद्धा ने ही डॉ. मुखर्जी को राजनीति के समर में झोंक दिया। आज़ादी से पूर्व वे हिन्दुओं के प्रवक्ता के रूप में उभरे और शीघ्र ही ‘हिन्दू महासभा’ में शामिल हो गए। सन 1944 में वे इसके अध्यक्ष भी नियुक्त किये गए थे।

पंडित जवाहरलाल नेहरु के कैबिनेट में वह उद्योग और संचय मंत्री थे। नेहरु के साथ विवाद के बाद उन्होंने कांग्रेस को त्याग दिया। उसके बाद उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की और उसके प्रथम अध्यक्ष बने। जनसंघ ने 1952 के संसदीय चुनाव में 3 सीटें जीतीं, जिनमें से एक स्वंय श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। वह अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के भी अध्यक्ष थे। मुखर्जी धारा 370 के विरोधी थे। उन्हें यह धारा भारत की एकता को खतरे के रूप में दिखती थी। इसके खिलाफ लडाई उन्होंने संसद में और संसद के बहार भी छेड़ी। संसद में दिए अपने भाषण में उन्होंने पुरजोर शब्दों में कहा था कि “राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है।” उस समय जम्मू-कश्मीर में अलग झंडा और अलग संविधान था। जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री भी तब प्रधानमंत्री कहलाता था। लेकिन डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे। इसीलिए उन्होंने एक नारा भी बुलंद किया कि ”एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे”। अगस्त, 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि “या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।” 11 मई 1953 के दिन मुखर्जी को कश्मीर में दाखिल होने पर कैद किया गया। वह कश्मीर के एकीकरण को लेकर लड़ने वाले महान योद्धा थे। श्रीनगर सेंट्रल जेल से, शहर से दूर एक कुटिया में उन्हें ले जाने के पश्चात उनकी मृत्यु 23 जून 1953 को अस्पष्ट परिस्थिति में हुई। उनका देहांत भारत के लिए कभी न भरने वाली हानि है।