गुरु गोबिंद सिंह

गुरु गोबिंद सिंह सिक्खों के दसवें गुरु थे, उनका जन्म 22 दिसंबर, 1616 में पटना, बिहार में हुआ था। उनका मूल नाम ‘गोबिन्द राय’ था। वे गुरु तेग बहादुर और माता गुजरी के पुत्र थे; उनके पिता गुरु तेगबहादुर जी ने हिन्दुओं की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना जीवन त्याग किया था।
“जब-जब होत अरिस्ट अपारा। तब-तब देह धरत अवतारा।”
कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अन्याय एवं अनाचार का साम्राज्य प्रबल होता है, तब-तब धर्म की रक्षा, मानवता के उद्धार और दुष्टों के नाश हेतु ईश्वर अवतार लेते हैं। गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म भी एक अवतार माना जाता है। उन्होंने राष्ट्र और धर्म की स्वतंत्रता व रक्षा के लिए सिक्खों को सैनिक परिवेश में ढाल कर संगठित शक्ति बनाया। गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 में बैसाखी के दिन ‘खालसा पंथ’ नामक समाज की स्थापना की, जिसके अनुयायियों के मन में धर्म की पुनः स्थापना के लिए एक सैनिक का साहस और एक संत के भाव का संचार किया जाता था। 1675 में अपने पिता की शहादत के उपरांत मात्र नौ वर्ष की आयु में वे सिक्खों के दसवें गुरु के रूप में नियुक्त हुए और 1708 ई. तक इस पद पर रहे।

गुरु गोबिंद सिंह जी एक महान योद्धा, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। अपने बचपन में गुरु गोबिंद सिंह ने संस्कृत, उर्दू, हिंदी बृज, गुरुमुखी और फ़ारसी जैसी कई बोलियां सीखीं। उन्होंने युद्ध कला भी सीखी और स्वयं को निपुण किया। गुरु गोबिंद सिंह के चार पुत्र थे, बाबा अजीत सिंह, बाबा जुझार सिंह, बाबा ज़ोरावर सिंह और बाबा फतह सिंह। गुरुजी स्वंय को खालसा का सेवक मानते थे। उन्होंने कहा था “इनकी सेवा मुझे आनंदित करती हैं ; इससे ज्यादा प्रिय मेरे लिए कुछ नहीं”। वे समानता में विश्वास रखते थे। उन्होंने अपने पांच वफादारों को अमृत चखाकर उन्हें ‘पंज प्यारे’ का नाम एवं ‘सिंह’ की उपाधि दी। गुरु गोबिंद सिंह एक महान योद्धा और आध्यात्मिक गुरु थे। वे एक सदय दानी थे जिन्होंने धर्म के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया। गुरु गोबिंद सिंह के दोनों बड़े पुत्रों ने मुगलों से युद्ध के समय अपने धर्म की रक्षा करते हुए प्राणाहुति दी तथा दो सबसे छोटे बेटों को इस्लाम न कबूल करने पर जिंदा दीवार में दफना दिया गया था। उनकी आयु केवल 5 और 8 वर्ष थी। अपने पुत्रों की मृत्यु की ख़बर सुनने के उपरांत माता गुजरी जी ने भी अपनी देह त्याग दी। गढ़वाली राजाओं और मुगलों के साथ दोहराते विवादों के बाद गुरु गोबिंद सिंह ने फ़ारसी में औरंगज़ेब को एक पत्र लिखा, जो बाद में जफ़रनामे के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उस पत्र में उन्होंने मुगलों को सिक्खों के साथ किए गए दुराचारों को याद कराया। 1705 में उन्होंने मुगलों के विरुद्ध युद्ध किया जिसे मुक्तसर के युद्ध के नाम से जाना जाता है।
गुरु गोबिंद सिंह सिख समुदाय के दसवें गुरु थे, उन्होंने ने गुरु ग्रन्थ साहिब को खालसाओं और सिक्खों का आगामी गुरु घोषित कर दिया था, उनके बाद गुरु ग्रन्थ साहिब को ही गुरु का दर्जा प्राप्त है। 7 अक्तूबर 1708 को गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी देह का त्याग कर दिया। धर्म की रक्षा हेतु गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रयास सदैव प्रेरणादायक हैं।